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मेरे आँगन में पहले इक्का-दुक्का

मेरे आँगन में पहले इक्का-दुक्का फिर सहसा ढेरों गुलाब खिल उठे. नया-नया घर था. बगीचें में गुलाब न हों तो बात जमती नही. अभी यह नजारा दो-चार दिन ही चला था कि फूल गायब होने लगे. हप्ते भर की चौकीदारी के बाद मैंने एक दिन भोर की बेला में पडोंस की कच्ची बस्ती में रहने वाली एक भद्र सी दिखाई देने वाली महिला को पकड़ ही लिया. पूछने पर वह बड़ी बेशर्मी से बोली, पूजा के लिए तोड़े है.
क्यों भाई, क्या तुम चोरी के फूलों से पूजा करोगी?
वह भुनभुनाती हुई चली गई. बड़ी बंगले वाली बनती है. दो-चार फूल क्या तोड़ लिए गजब हों गया.
अगला अटैक पडोसन की बेटी का था, हाय आंटी, मैं जरा उससे मिलने जा रही हूँ. एक फूल ले लूं ? लिहाज के मारे मैं कुछ बोलूँ,उससे पहले उसने सबसे बड़ा और सुन्दर फूल तोड़ा,फिर तो आये दिन यही होता रहा और में मनन मसोसकर रह जाती थी. बाद में तो बस सूचना भर आती, आंटी मैंने आपका एक गुलाब ले लिया था. मेरा तो मन मसोसकर रह जाता था. जी मे आता था कि गला दबा दू मगर क्या करू पड़ोस का ख्याल करना पड़ता था. वैसे भी अगर चुपचाप तोड़ ले जाती तो में उसका क्या कर सकती थी?हाय!हाय!क्या गुलाब खिले है? क्या करती हों इनका? अरे भाई पंखुडियां सुखाकर गुलकंद या शरबत क्यों नही बनातीं?
साथ ही बनाने का तरीका भी बताती गई.

दिल जलकर राख हो गया. इतनी मेहनत से गुलाब उगाये है की उन्हें आगन में झूमता-इतराता देखूं. सुगंध से आँगन महकता रहे,और ये है कि गुलकंद और शरबत बनाने की बात कर रही है. बाजार ढेरों गुलकंद और शरबत उपलब्ध है. उसके लिए मेहनत की जरूरत क्या है. उनके मुताबिक हर वस्तु को उपयोग या धन में बदलना जरूरी है. डाली पर खिले फूल का सौंदर्य उन्हें बेकार लगता है.
आँगन में खिले गुलाब अब एक पैमाना बन गए है. हर व्यक्ति की दृष्टि में उनका एक अलग और सही उपयोग है. अम्मा उनसे पुष्पहार बनाकर ठाकुर की पूजा में चढाने को उनका सही उपयोग मानती है. नन्ही बिटिया अपनी मैडम को देने में. गुप्ता जी जब किसी उत्सव,शादी-व्याह जा रहे होते है तो एक निगाह हमारी बगिया पर डालना न भूलते. पर वे कभी अपनी इच्छा व्यक्त न कर सके और हमारे गुलाब बचे रहे.
खैर गुलाब की झाडियाँ काट-छाँट दी गयी. उनमे फिर से पत्ते व शाखें उग आई. अब फिर से फूलों का मौसम आ गया. आप भी अपने आँगन में गुलाब उगाईये. अपनी रातों की नींद उडाईये, साथ ही व्यक्ति परीक्षण की कसौटी भी बना लीजिये

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