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poems > Fathers Day

फादर्स डे पर पिता को समर्पित एक हिन्दी कविता

दुनियादारी मे वफादारी वो कुछ इस तरह निभाया करता है
अपनी आँगन का फूल किसी और बगीचे में सजाया करता है।
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उचाईयों कि ख्वाहिश लिए जब जिद करता है परिंदा उसका
तीनका तीनका गिरवी रखकर अपनी भुख दबाया करता है।
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हालात चाहे हरादे उसे पर लड़ना नहीं छोडता हैं वो
मेहनत हथेली पर रखकर अपना नसीब आजमाया करता है।
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जरूरत और जिम्मेदारी के नाम पर कतल करता है अरमान अपने
झूठी मुस्कान के आड़े अपना गम छुपाया करता है।

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