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poems > Life

जात सिर्फ खुदा दी उच्ची

वेख फरीदा मिट्टी खुली ( कबर )
मिट्टी उत्ते मिट्टी डुली ( मृत देह )
मिट्टी हस्से मिट्टी रोवे ( मनुष्य )
अंत मिट्टी दा मिट्टी होवे ( शरीर )
न कर बंदेया मेरी मेरी
न एह तेरी न एह मेरी
चार दिनां दा मेला दुनिया
फेर मिट्टी दी बन गई ढेरी
न कर एत्थे हेरा फेरी
मिट्टी नाल न धोखा कर तू
तू वी मिट्टी ओ वी मिट्टी
जात पात दी गल्ल न कर तू
जात वी मिट्टी पात वी मिट्टी
जात सिर्फ खुदा दी उच्ची
बाकी सब कुछ मिट्टी🙏

A Kalam by Baba Farid on equality in each every human

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