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"क़तरा-क़तरा बूँद-बूँद वह भी डरते-डरते जल्दी जल्दी

"क़तरा-क़तरा बूँद-बूँद
वह भी डरते-डरते
जल्दी जल्दी और थरथराते
भला इस तरह भी कभी,
किसी की प्यास बुझी है ?

तू तो ठाठें मारता सागर है,
खुला-गहरा और विशाल
हंसता-खेलता और खुशहाल
सागर तो बहुत कुछ देता है
उन सबको
जो उससे मोहब्बत करते है ।



क्यों नही ऍक बार
केवल ऍक बार
अपनी लहरों मे लपेट कर
मुझे उन गहराईयों में डुबो देते,
जहाँ से मैं कभी भी
बाहर न निकल सकूँ...



अगर निकलूं
तो इतना भीगकर
कि अगले सात जन्मों तक
कभी किसी के पास
प्यास की शिकायत न करूँ
मेरे प्रशान्त ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰"

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