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जार जार क्यों रोता है

शहीदों को शत् शत् नमन....आओ मँथन करें-


जार जार क्यों रोता है
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भगत तेरा केसरिया बाना,
जार जार क्यों रोता है

मथकर  मर्यादाएं  हमला,
बार बार  क्यों होता है

चंद्र ग्रसित है गोपीचंद से,
सुप्त सुभाष सा सागर है

संसद में संविधान सदा ही,
हार हार क्यों सोता है

दिल्ली दहली सहमा सूरत,
गमज़दा गोहाटी की गलियां

बोम्बे की बगिया में कीकर,
खार खार क्यों बोता है

-राज बिजारणियाँ

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हुआ हुक्म जब फांसी का तो भगत सिंह यूँ मुस्काया
बोला माँ अब गले लगा लो मुद्दत में मौक़ा आया
तख़्ते फाँसी कूंच पेजब क़दमों की आहट आती थी
तो दीवारें भी झूम-झूम कर वंदेमातरम् गाती थीं
चूम के फाँसी का फन्दा जब इंक़लाब वो बोला था
काँप उठी थी वसुंधरा अंग्रेज़ी शासन डोला था
आख़िर बोला यही वसीयत ऐ रखवाले करता हूँ
माँ की लाज बचा लेना अब तुम्हे हवाले करता हूँ
आओ तुमको इंक़लाब की ताक़त मैं दिखलाता हूँ
छोड़ दिए तुमने जो पन्ने उनकी याद दिलाता हूँ ।

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