Search More

poems > Positive

ये पाप हैं क्या, ये

ये पाप हैं क्या, ये पुण्य हैं क्या, रीतोंपर धर्म की मुहरे हैं
हर युग में बदलते धर्मोंको कैसे आदर्श बनाओगे

ये भोग भी एक तपस्या हैं, तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचेता का होगा, रचना को अगर ठुकराओगे

हम कहते हैं ये जग अपना हैं, तुम कहते हो झूठा सपना हैं
हम जनम बीताकर जाएंगे, तुम जनम गवाकर जाओगे..................

Latest poems